Vipul Goswami

Vipul Goswami As you knows.. I am.

18/05/2026

14/05/2026
08/05/2026

*स्वात्म संदर्शन*

मैं के दो स्वरूप हैं, एक अहंकार सहित - देह, नाम, रूप, गुण और व्यक्ति, वस्तु, स्थान से संबंध। दूसरा है अहंकार रहित - सत्व, रज और तम गुण और प्रभाव से रहित।
अध्यात्म साधना में मैं के यह दोनों ही स्वरूप महत्वहीन है। निष्प्रयोजन होते हुए साधना अज्ञानवश इन्हीं स्वरूपों में निरन्तर केंद्रित रहती है। इस कारण साधना का लक्ष्य प्राप्त नहीं होता। हां! साधना की इस स्थिति में कुछ अनुभूतियां होना स्वाभाविक है, लेकिन वह लक्ष्य प्राप्ति नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण साधना और लक्ष्य को भिन्न मानना है और मैं के दोनों ही स्वरूपों में निहित मैं की स्थिति, उपस्थिति, उस अस्तित्व को ही अनुभव करना ही लक्ष्य है - शुद्ध, सत, निर्गुण, निरहंकार, गुणातीत, मायातीत।

विपुल गोस्वामी, बीकानेर।

06/01/2026

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