21/11/2025
हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय इन बातों को नजरअंदाज न करें
हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय लोग अक्सर कम प्रीमियम देखकर खुश हो जाते हैं, लेकिन पॉलिसी की असली सुरक्षा उसके बातों में छुपी होती है. इन बातों को नजरअंदाज करना बाद में क्लेम रिजेक्शन का कारण बन सकता है. यहां जानिए वो 5 जरूरी बातों जिन्हें ध्यान से पढ़ना जरूरी है और जो बताते हैं कि वास्तव में आपकी पॉलिसी कितनी मजबूत है
हेल्थ इंश्योरेंस आज की जरूरत है, लेकिन इसे खरीदते समय सबसे ज्यादातर लोग सबसे पहले ये देखते हैं कि कौन सी पॉलिसी सस्ती है. लेकिन कम प्रीमियम देखकर जो पॉलिसी आपको बढ़िया डील लग रही होती है, वो क्लेम के समय बड़ी दिक्कत खड़ी कर सकती है. वजह है पॉलिसी के अंदर छुपे हुए बातों, जिन्हें पढ़ना लोग भूल जाते हैं. अगर आप चाहते हैं कि जरूरत के समय पॉलिसी आपकी जेब पर भार न डाले, तो इन 5 बातों को समझना बेहद जरूरी है. ये बातों बताते हैं कि वास्तव में आपकी पॉलिसी कितनी दमदार है.
1. वेटिंग पीरियड पॉलिसी का सबसे अहम बातों
वेटिंग पीरियड वो समय होता है जिसके दौरान आप कुछ बीमारियों के लिए क्लेम नहीं कर सकते. कई लोग सोचते हैं कि पॉलिसी खरीदते ही कवरेज स्टार्ट हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं है.
शुरुआती वेटिंग पीरियड
ज्यादातर पॉलिसियों में 30 से 90 दिन का वेटिंग पीरियड होता है. इस दौरान सिर्फ एक्सीडेंट की कंडीशन में ही क्लेम मिलता है. बाकी किसी बीमारी के मामले में क्लेम नहीं किया जा सकता.
पहले से मौजूद बीमारियों (PED) का वेटिंग पीरियड
अगर आपको पहले से कोई बीमारी है जैसे डायबिटीज, हाइपरटेंशन, थायराइड आदि, तो उसका कवरेज आमतौर पर 2 से 4 साल बाद शुरू होता है.
कुछ खास बीमारियों के लिए वेटिंग पीरियड
मोतियाबिंद, हर्निया, घुटना प्रत्यारोपण जैसी बीमारियों पर भी 1–2 साल का वेटिंग पीरियड हो सकता है.
क्या करें
जब भी पॉलिसी खरीदें तो वेटिंग पीरियड के बातों को बहुत ध्यान से पढ़ें और हमेशा कम वेटिंग पीरियड वाली पॉलिसी चुनें और अपने PED के बारे में कंपनी को ईमानदारी से बताएं.
2. सब-लिमिट (Sub-Limits): -छुपी हुई कैप जो आप पर डालती है भार
सब-लिमिट उन खर्चों पर लगाई जाने वाली सीमा है जहां कंपनी तय करती है कि वो कितना भुगतान करेगी, बाकी आपको अपनी जेब से देना होगा.
उदाहरण
आपकी पॉलिसी का कवरेज 5 लाख है. लेकिन मोतियाबिंद ऑपरेशन के लिए सब-लिमिट सिर्फ ₹30,000 है. अगर ऑपरेशन के बाद बिल ₹50,000 आता है, तो ₹20,000 आपको देना पड़ेगा.
कहां-कहां लगती है सब-लिमिट
• रूम रेंट
• डॉक्टर विजिट
• एम्बुलेंस चार्ज
• कुछ बीमारियां जैसे किडनी स्टोन, हर्निया आदि
क्या करें
पॉलिसी खरीदते समय इस बातों को गलती से भी इग्नोर न करें क्योंकि ये सीधे आपकी जेब पर असर डालती है. ऐसी पॉलिसी चुनें जिसमें सब-लिमिट न हो या फिर काफी कम हो.
3. को-पेमेंट (Co-payment):- क्लेम का हिस्सा जो आपको भरना होता है
हेल्थ पॉलिसी का ये बातों बताता है कि क्लेम की राशि में से कितना प्रतिशत आपको भरना है और कितना कंपनी भरेगी. जैसे मान लीजिए कि अगर आपकी पॉलिसी में 10% को-पेमेंट तय है और आपका हॉस्पिटल बिल ₹1,00,000 है, तो कंपनी आपको सिर्फ 90,000 रुपए देगी, बाकी 10,000 आपको अपनी जेब से भरने होंगे.
क्या करें
बिना को-पेमेंट वाली पॉलिसी चुनने की या फिर बहुत मिनिमम को-पेमेंट वाली पॉलिसी चुनने की कोशिश करें.
4. नेटवर्क हॉस्पिटल कवरेज: -कैशलैस सुविधा इसी पर निर्भर
बहुत लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन इससे क्लेम की आसानी तय होती है. अगर कंपनी के नेटवर्क में हॉस्पिटल कम हैं, तो आपको कैशलैस सुविधा नहीं मिलेगी और जेब से पैसा देना पड़ सकता है. अगर आपका शहर छोटा है या आपके आसपास चुनिंदा अस्पताल हैं, तो नेटवर्क का मजबूत होना बहुत जरूरी है. अक्सर कम प्रीमियम वाली पॉलिसियों का नेटवर्क छोटा होता है, जिससे कैशलेस सुविधा नहीं मिल पाती और जेब ढीली करनी पड़ती है.
क्यों जरूरी
• कैशलेस सुविधा
• बिल सेटलमेंट में कोई झंझट नहीं
• इमरजेंसी में तुरंत इलाज
• TPA से कम झिक-झिक
क्या करें
अपने घर और ऑफिस के आसपास के नेटवर्क हॉस्पिटल्स की लिस्ट जरूर चेक करें.
5. एक्सक्लूजन : क्या चीजें कवर नहीं हैं
हर पॉलिसी में कुछ चीजें शुरुआत से ही कवर नहीं होतीं. इन्हें समझना बेहद जरूरी है.
स्थायी एक्सक्लूजन
कुछ चीजें स्थायी रूप से बाहर होती हैं जैसे कॉस्मेटिक सर्जरी, जानबूझकर खुद को पहुंचाई गई चोट, एड्स, युद्ध या परमाणु हमले से हुई बीमारियां आदि.
अस्थायी एक्सक्लूजन
इसमें वेटिंग पीरियड वाली बीमारियां शामिल होती हैं. इसके अलावा, वैकल्पिक उपचार जैसे एक्यूप्रेशर, नेचुरोपैथी आदि भी ज्यादातर पॉलिसियों में कवर नहीं होते हैं.