DBS Enterprises

DBS Enterprises My expertise in both finance and apparel clothing allows me to provide tailored solutions that meet the unique needs of my clients.

DBS Enterprises is a dedicated financial consultant with extensive experience in the insurance brokerage sector, mutual funds specializing in helping clients navigate their financial futures with confidence. I am a dedicated financial consultant & garment merchandiser with extensive experience in the insurance brokerage sector & garment industries, specializing in helping clients navigate their fi

nancial futures with confidence. I am passionate about empowering individuals and businesses to achieve their financial goals through informed decision-making and strategic planning.

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01/04/2026

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01/02/2026

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Take right decision at right time

10/01/2026

जब लोग ऑनलाइन पॉलिसी खरीदते हैं तो वह सिर्फ सस्ता इंश्योरेंस ढूंढ रहे होते हैं. अक्सर लोग पॉलिसी की छिपी शर्तों को नहीं पढ़ते. कई बार सिर्फ सस्ते के चक्कर में पड़कर लोग जरूरी एडऑन भी नहीं लेते हैं. ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर कैसे तय करें कि हेल्थ-इंश्योरेंस में क्या शामिल कराएं और क्या नहीं.
1. रूम रेंट लिमिट:
हेल्थ इंश्योरेंस में लोगों के साथ सबसे बड़ा धोखा यहीं होता है. कई बार कंपनियां ठीक से नहीं बतातीं कि रूम रेंट की कोई लिमिट है या नहीं. मान लीजिए आपका हेल्थ इंश्योरेंस 5 लाख का है और रूम रेंट लिमिट 1% है. यानी आप 5,000 रुपये तक का रूम ले पाएंगे. बता दें कि आज के वक्त में अगर आप किसी बड़े अस्पताल में भर्ती होते हैं तो वहां रूम रेंट ही 10 हजार रुपये तक चला जाता है. ऐसे में हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी आपको सिर्फ 5000 रुपये देगी, जबकि बचा हुआ 5000 रुपया आपको खुद चुकाना होगा. तो ऐसी पॉलिसी लें, जिसमें 'No Room Rent Limit' हो
2. रीस्टोरेशन बेनिफिट
यह फीचर आपको अपनी पॉलिसी में जरूर रखना चाहिए. इसके तहत अगर आपके इंश्योरेंस का सम इंश्योर्ड पूरा इस्तेमाल हो जाता है तो वह फिर से रीस्टोर हो जाएगा. यानी अगर आपकी 10 लाख रुपये की पॉलिसी है और आपका मेडिकल बिल 10 लाख का आ जाता है तो आपका सम इंश्योर्ड खत्म होते ही कंपनी फिर से उसे रीस्टोर कर देगी और साल के बचे हुए महीनों के लिए आपके पास फिर से 10 लाख रुपये का बैलेंस हो जाएगा.
3. वेटिंग पीरियड जरूर देखें
बीमा लेते ही हर बीमारी कवर नहीं होती. कई ऐसी बीमारियां होती हैं जिनके लिए कुछ महीने या साल का वेटिंग पीरियड होता है. पॉलिसी में इन्हें ध्यान से पढ़ें, तभी पॉलिसी लें. एक बार अलग-अलग कंपनियों की तुलना भी कर लें, जहां वेटिंग पीरियड कम हो उस पॉलिसी की तरफ जा सकते हैं, ताकि आपको फायदा हो.
4. को-पेमेंट से रहें संभल कर
कई बार कंपनियां को-पेमेंट जोड़कर आपके इंश्योरेंस प्रीमियम को सस्ता कर देती हैं. यानी हो सकता है वह कहें कि आपकी पॉलिसी में 20 फीसदी को-पेमेंट होगा और आपका प्रीमियम सस्ता हो जाएगा. ऐसे में आपको तुरंत सचेत हो जाना है. अब मान लीजिए आपका अस्पताल का बिल 1 लाख रुपये आता है तो उसमें से 80 हजार रुपये तो कंपनी दे देगी, लेकिन बचे हुए 20 हजार रुपये आपको खुद भरने होंगे.
5. प्री और पोस्ट हॉस्पिटलाइजेशन
जब बात आती है इलाज की तो सिर्फ अस्पताल में भर्ती होना ही मायने नहीं रखता. कई बीमारियों में भर्ती होने से पहले और बाद में कई सारे टेस्ट होते हैं. ऐसे में आपको उस पॉलिसी को वरीयता देनी चाहिए जिसमें प्री और पोस्ट हॉस्पिटलाइजेशन ज्यादा हो. वरना सस्ते प्रीमियम के चक्कर में आपको भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.
6. नो क्लेम बोनस के फायदे भी देखें
अगर आप साल भर बीमार नहीं पड़े और कोई क्लेम नहीं लिया, तो कंपनी आपको इनाम देती है. हो सकता है कि सस्ते प्रीमियम का लालच देकर कंपनी आपको ये फायदा ना दे. यह फायदा लेना बहुत जरूरी है, क्योंकि इससे साल दर साल आपका सम इंश्योर्ड बढ़ता जाता है.
7. डे केयर ट्रीटमेंट चेक करें
आज के दौर में टेक्नोलॉजी इतनी आगे बढ़ चुकी है कि कई सर्जरी जैसे मोतियाबिंद या डायलिसिस 24 घंटे से भी कम में हो जाती है. ऐसे में आपको यह भी सुनिश्चित करना होगा सभी डे केयर ट्रीटमेंट आपकी पॉलिसी में कवर हों, वरना आपको दिक्कत हो सकती है.

RBI ने NBFCs के लिए Stressed Assets को handle करने का पूरा system बदल दिया है।👉 ये कोई advisory नहीं है —👉 ये binding Ma...
04/01/2026

RBI ने NBFCs के लिए Stressed Assets को handle करने का पूरा system बदल दिया है।
👉 ये कोई advisory नहीं है —
👉 ये binding Master Direction है।
📌 RBI (NBFC – Resolution of Stressed Assets) Directions, 2025 के अनुसार:
✔️ हर NBFC को Board-approved written policy रखनी होगी
✔️ Stressed assets की early पहचान और reporting अनिवार्य
✔️ Compromise settlement सिर्फ़ तय process से ही होगा
✔️ Technical / write-off बिना policy और approval के नहीं
✔️ Multiple lenders होने पर inter-creditor coordination mandatory
✔️ CRILC reporting और timelines ignore करने पर
➡️ higher provisioning + regulatory action possible
⚠️ बहुत बड़ी गलती जो लोग करते हैं:
“Loan खराब है, write-off कर दो”
❌ अब ऐसा नहीं चलेगा
✔️ Process + documentation + approval जरूरी है
📌 Important timeline clarity:
हालाँकि notification Nov 2025 की है,
लेकिन compliance expectation 2 January 2026 से effective मानी जा रही है।
👉 Simple भाषा में:
NBFC recovery अब judgement call नहीं,
बल्कि policy-driven, auditable process है।

हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय इन बातों को नजरअंदाज न करेंहेल्थ इंश्योरेंस लेते समय लोग अक्सर कम प्रीमियम देखकर खुश हो जाते ह...
21/11/2025

हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय इन बातों को नजरअंदाज न करें

हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय लोग अक्सर कम प्रीमियम देखकर खुश हो जाते हैं, लेकिन पॉलिसी की असली सुरक्षा उसके बातों में छुपी होती है. इन बातों को नजरअंदाज करना बाद में क्लेम रिजेक्शन का कारण बन सकता है. यहां जानिए वो 5 जरूरी बातों जिन्हें ध्यान से पढ़ना जरूरी है और जो बताते हैं कि वास्तव में आपकी पॉलिसी कितनी मजबूत है
हेल्थ इंश्योरेंस आज की जरूरत है, लेकिन इसे खरीदते समय सबसे ज्यादातर लोग सबसे पहले ये देखते हैं कि कौन सी पॉलिसी सस्ती है. लेकिन कम प्रीमियम देखकर जो पॉलिसी आपको बढ़िया डील लग रही होती है, वो क्लेम के समय बड़ी दिक्कत खड़ी कर सकती है. वजह है पॉलिसी के अंदर छुपे हुए बातों, जिन्हें पढ़ना लोग भूल जाते हैं. अगर आप चाहते हैं कि जरूरत के समय पॉलिसी आपकी जेब पर भार न डाले, तो इन 5 बातों को समझना बेहद जरूरी है. ये बातों बताते हैं कि वास्तव में आपकी पॉलिसी कितनी दमदार है.
1. वेटिंग पीरियड पॉलिसी का सबसे अहम बातों
वेटिंग पीरियड वो समय होता है जिसके दौरान आप कुछ बीमारियों के लिए क्लेम नहीं कर सकते. कई लोग सोचते हैं कि पॉलिसी खरीदते ही कवरेज स्टार्ट हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं है.
शुरुआती वेटिंग पीरियड
ज्यादातर पॉलिसियों में 30 से 90 दिन का वेटिंग पीरियड होता है. इस दौरान सिर्फ एक्सीडेंट की कंडीशन में ही क्लेम मिलता है. बाकी किसी बीमारी के मामले में क्लेम नहीं किया जा सकता.
पहले से मौजूद बीमारियों (PED) का वेटिंग पीरियड
अगर आपको पहले से कोई बीमारी है जैसे डायबिटीज, हाइपरटेंशन, थायराइड आदि, तो उसका कवरेज आमतौर पर 2 से 4 साल बाद शुरू होता है.
कुछ खास बीमारियों के लिए वेटिंग पीरियड
मोतियाबिंद, हर्निया, घुटना प्रत्यारोपण जैसी बीमारियों पर भी 1–2 साल का वेटिंग पीरियड हो सकता है.
क्या करें
जब भी पॉलिसी खरीदें तो वेटिंग पीरियड के बातों को बहुत ध्यान से पढ़ें और हमेशा कम वेटिंग पीरियड वाली पॉलिसी चुनें और अपने PED के बारे में कंपनी को ईमानदारी से बताएं.

2. सब-लिमिट (Sub-Limits): -छुपी हुई कैप जो आप पर डालती है भार
सब-लिमिट उन खर्चों पर लगाई जाने वाली सीमा है जहां कंपनी तय करती है कि वो कितना भुगतान करेगी, बाकी आपको अपनी जेब से देना होगा.
उदाहरण
आपकी पॉलिसी का कवरेज 5 लाख है. लेकिन मोतियाबिंद ऑपरेशन के लिए सब-लिमिट सिर्फ ₹30,000 है. अगर ऑपरेशन के बाद बिल ₹50,000 आता है, तो ₹20,000 आपको देना पड़ेगा.
कहां-कहां लगती है सब-लिमिट
• रूम रेंट
• डॉक्टर विजिट
• एम्बुलेंस चार्ज
• कुछ बीमारियां जैसे किडनी स्टोन, हर्निया आदि
क्या करें
पॉलिसी खरीदते समय इस बातों को गलती से भी इग्नोर न करें क्योंकि ये सीधे आपकी जेब पर असर डालती है. ऐसी पॉलिसी चुनें जिसमें सब-लिमिट न हो या फिर काफी कम हो.
3. को-पेमेंट (Co-payment):- क्लेम का हिस्सा जो आपको भरना होता है
हेल्थ पॉलिसी का ये बातों बताता है कि क्लेम की राशि में से कितना प्रतिशत आपको भरना है और कितना कंपनी भरेगी. जैसे मान लीजिए कि अगर आपकी पॉलिसी में 10% को-पेमेंट तय है और आपका हॉस्पिटल बिल ₹1,00,000 है, तो कंपनी आपको सिर्फ 90,000 रुपए देगी, बाकी 10,000 आपको अपनी जेब से भरने होंगे.
क्या करें
बिना को-पेमेंट वाली पॉलिसी चुनने की या फिर बहुत मिनिमम को-पेमेंट वाली पॉलिसी चुनने की कोशिश करें.
4. नेटवर्क हॉस्पिटल कवरेज: -कैशलैस सुविधा इसी पर निर्भर
बहुत लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन इससे क्लेम की आसानी तय होती है. अगर कंपनी के नेटवर्क में हॉस्पिटल कम हैं, तो आपको कैशलैस सुविधा नहीं मिलेगी और जेब से पैसा देना पड़ सकता है. अगर आपका शहर छोटा है या आपके आसपास चुनिंदा अस्पताल हैं, तो नेटवर्क का मजबूत होना बहुत जरूरी है. अक्सर कम प्रीमियम वाली पॉलिसियों का नेटवर्क छोटा होता है, जिससे कैशलेस सुविधा नहीं मिल पाती और जेब ढीली करनी पड़ती है.

क्यों जरूरी
• कैशलेस सुविधा
• बिल सेटलमेंट में कोई झंझट नहीं
• इमरजेंसी में तुरंत इलाज
• TPA से कम झिक-झिक
क्या करें
अपने घर और ऑफिस के आसपास के नेटवर्क हॉस्पिटल्स की लिस्ट जरूर चेक करें.
5. एक्सक्लूजन : क्या चीजें कवर नहीं हैं
हर पॉलिसी में कुछ चीजें शुरुआत से ही कवर नहीं होतीं. इन्हें समझना बेहद जरूरी है.
स्थायी एक्सक्लूजन
कुछ चीजें स्थायी रूप से बाहर होती हैं जैसे कॉस्मेटिक सर्जरी, जानबूझकर खुद को पहुंचाई गई चोट, एड्स, युद्ध या परमाणु हमले से हुई बीमारियां आदि.
अस्थायी एक्सक्लूजन
इसमें वेटिंग पीरियड वाली बीमारियां शामिल होती हैं. इसके अलावा, वैकल्पिक उपचार जैसे एक्यूप्रेशर, नेचुरोपैथी आदि भी ज्यादातर पॉलिसियों में कवर नहीं होते हैं.

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16/11/2025

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