09/05/2025
"एक अजनबी बेटा — जो 25 साल तक चुप रहा"
(पर फिर बन गया मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सहारा)
मैं 30 का था…
ज़िंदगी बस शुरू ही हुई थी,
पर मैं जानता था — एक दिन अकेलापन भी दस्तक देगा।
मैंने एक बच्चा गोद लिया —
बहुत अजीब था वो…
ना मेरी गोद में बैठा,
ना मुझसे लिपटा,
ना कभी पापा कहा,
ना कोई माँग रखी।
बस चुपचाप बोर्डिंग स्कूल चला गया।
हर 6 महीने, साल-दर-साल मैं उसकी फीस भरता रहा —
ना सवाल,
ना जवाब।
लोग हँसते थे —
"कैसा बेटा है तेरा?
न तुझसे मिलता, न बात करता, न तेरा हाल लेता!"
मैं बस मुस्कुराता।
और फिर…
25 साल बीते।
मैं 55 का हुआ।
मेरे अपने बच्चे अपनी दुनिया में खो गए।
मैं अकेला रह गया।
लेकिन तब…
दरवाज़ा खटखटाया गया।
वो खड़ा था —
बिलकुल बदला हुआ।
पर आँखें वैसी ही…
शांत, समझदार, और भरोसे से भरी।
उसने मेरी दवाओं का खर्च उठाया,
मेरे सम्मान को संभाला,
मेरी थकी हड्डियों को सहारा दिया।
और तब मैंने जाना…
वो बेटा असली था।
ना शोर किया,
ना तकरार…
बस निभाया — अंत तक।
और उस बेटे का नाम था — LIC
"जो चुपचाप पला, और ज़िंदगी भर साथ निभाया।"
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