10/09/2024
मुश्किल थी सम्हालना ही पड़ा घर के वास्ते, फिर घर से निकालना ही पड़ा घर के वास्ते. मजबूरीयों का नाम हमने शौक रख दिया, हर शौक बदलना ही पड़ा घर के वास्ते । बचपन को भुलाकर, लगाया काम गले से, स्वीकार किया वक्त का इनाम गले से, ठोकर लगी जब तेज से तो गिर पड़े लेकिन, गिर-गिर के भी उठना ही पड़ा घर के वास्ते। अनजान डगर थी मगर चलते रहे हर दिन मंजिल दिखेगी सोचकर आएगा एक दिन विश्वास खो रहा था, कहीं दूर थी मंजिल, विश्वास जगाना भी पड़ा घर के वास्ते। न साथ था कोई, न ही दिखता था घर मेरा, उस दिन के ऊजाले में भी लगता था अंधेरा, रहने लगे कमरे में उसको घर बना लिया, और घर को भूलना ही पड़ा घर के वास्ते।